नदी तट पर खड़ा व्यथित,
धुंध के पार जाने को तैयार;
उन पलों को क्यों न बाँधा,
जब जाना ही था उस पार !
रहा तू सच से अंजान क्यों,
क्यों ना किया तूने स्वीकार;
कहाँ छोड़ अाया उन लम्हों को,
अब क्या ले जाएगा उस पार ?

 

मुड़कर अब क्या देख रहा,
यादें भी धुँधली हो गई तेरी;
कैसे अमिट छाप छोड़ती,
जिन्हें नहीं मिली कद्र तेरी !

गौण समझा तूने उन्हें तब,
इन पलों को कल जी लेगा;
किस सोच मे अाज खड़ा तू,
तेरा कल क्या उस पार मिलेगा ?

उस पार कैसे तोड़ेगा टहनियाँ,
वो कोटर वाला पेड़ ना होगा;
कैसे डूबेगी कागज की किश्ती,
वो बचपन वाला खेल ना होगा !

कब करेगा तू जी भर के बातें,
वो गुस्से वाला प्यार ना होगा;
कब लौटेगा तू घर को वापस,
वो ममता वाला साया ना होगा !

उस पार किस भरोसे तू हँसेगा,
वो यादों वाला हमसफर ना होगा;
किस हिम्मत से तू तब लड़ेगा,
वो साथ देने वाला वादा ना होगा !

किन अाँखों में खोजेगा बचपन,
वो छूने वाला भोलापन ना होगा;
किन कदमों को चलना सिखाएगा,
वो परियों वाला रूप ना होगा !

इस पार छलावों के पीछे दौड़ा,
क्या उस पार भी तू यही करेगा;
निकल पड़ा हैं अपने सफर पर,
उन लम्हों को क्या उस पार जियेगा ?

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