मासूम से उन भावों से

मन को जब छेड़ जाती है

मायूस से उस मौसम में

मुस्कान जब कौंध जाती है

 

शरारती सी इस उम्मीद में

उस कविता को

अपना कहने का जी चाहता है

 

उन शब्दों को याद कर

पलकें जब भींग जातीं हैं

वह आँसू की गर्म बूँद

सीने को जब भेद जाती है

 

दर्द के इस एहसास में

उस कविता को

अपना कहने का जी चाहता है

 

दिल में होते हुए भी

होठों पर जब आ नहीं पाती है

परछाइयों के दिखते भी

नजरें जब छू नहीं पातीं हैं

 

पाकर खोने की इस कसक में

उस कविता को

अपना कहने का जी चाहता है

 

ज़िन्दगी की ये कविता

आज क्यों रूठ चली है

अपनी ही तो थी ये

फिर क्यों कही दूर खड़ीं है

 

पर जाने ना क्यों मैं

आज भी यह समझ नहीं पाया

 

वो कल्पना

किसी और की थी

वो कविता

किसी और की थी

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