माँ ! हम क्यों हैं ऐसे ?

माटी के गुड्डे से खेलूँ कैसे ?

हाथ इसका टूट गया है,

मन मेरा अब ऊब गया है |

 

मीना की गुडिया है कितनी सुन्दर,

मेरा गुड्डा लगे है बन्दर |

वो पहने घडी और गहना,

मुझे दिला दो वैसा खिलौना !

 

माँ ! हम क्यों हैं ऐसे ?

कोमल गुडिया से खेलूँ कैसे ?

सजाने में इसे मजा नहीं आता,

जी मेरा अब इससे भर जाता

 

चंदू का गुड्डा है कितना बहादुर,

मेरी गुडिया इन सबसे दूर|

सीखा उसने जंग में रहना,

मुझे दिला दो वैसा खिलौना !

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