तुम जब पास होते थे मेरे

जाने ना क्यों

छलक जाती थीं ये आँखें|

 

लबों की भोली मुस्कान पर भी

जाने ना क्यों

नम हो जाती थीं ये आँखें|

 

तुझे देख पाने की ख़ुशी को

जाने ना क्यों

समा ना पाती थीं ये आँखें|

 

तेरी परछाई आज

जाने ना क्यों

दूरियों के अंधेरो में कहीं  खो गयी

 

वो मुस्कान भी आज

जाने ना क्यों

यादों के उजालों में धुंधली हो गयी

 

तेरी तलाश में इस भीड़ में भी

जाने ना क्यों

खुद में खोई रहती हैं ये आँखें

 

तेरा मुझमे होकर भी ना होना

जाने ना क्यों

देख नहीं पाती हैं ये आँखें

 

तुम तो अब पास नहीं मेरे तब

जाने ना क्यों

आज फिर भीगी है ये आँखें

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