जब चिलचिलाती धूप में

माथें के पसीनें पर

ठंडी हवा पड़ती थी ;

तब

तुमसे एक बात कहनी थी |

 

जब जाड़ें की अलसाई सुबह

ओंस की बूंदों पर

सुनहरी किरणें पड़ती थीं ;

तब

तुमसे एक बात कहनी थी |

 

जब थके हुए दिन को भूल

तारे निहारने में छत पर

सांझें और रात कटती थी ;

तब

तुमसे एक बात कहनी थी |

 

जब मायूस हो चुके मौसम में

बारिश की बूँदें मिट्टी पर

गिर सोंधी खुशबू उठातीं थीं ;

तब

तुमसे एक बात कहनी थी |

 

जब टूटे हुए मन और नम आँखों में

हार चुकी हर उम्मीद पर

तुम इन अहसासों सी आतीं थीं ;

तब

तुमसे यह बात कहनी थी |

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