जीवन-सृष्टि में अन्धकार है

दुस्वप्न सारे लगते साकार हैं

अभी तम से घिरा आकाश है

फिर भी मन में एक आस है

प्रकाश होगा सूरज पाने के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

 

देव-दानव की साझेदारी है

विपरीत विचारों की यारी है

कंधो पर सिद्धान्तों की लाश है

फिर भी मन में एक आस है

प्रभुता होगी की शक्ति पाने के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

 

निच्छल कहलाया सागर है

मथना तो इसका अनादर है

खो दूँगा जो मेरे पास है

फिर भी मन में एक आस है

चन्द्र मिलेगा ज्वार के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

 

जड़ों से दूर खड़ा मंदार है

माटी को झेलना लहरों का वार है

अडिगता के मान में आया ह्रास है

फिर भी मन में एक आस है

आँधियां रुकेंगी टकराने के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

 

रस्सी सा बंधा शेषनाग है

चर्म पर जलन की आग है

पल-पल उखड़ती श्वास है

फिर भी मन में एक आस है

शय्या बनूँगा क्षीर जाने के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

 

लेना पड़ा कछुए का अवतार है

पीठ पर तो पहाड़ का भार है

जगतपालक आज बना दास है

फिर भी मन में एक आस है

पुष्पित होगी धरा अवतरण के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

 

यहाँ किसे नहीं कुछ कष्ट है

लक्ष्य-मार्ग कुछ भी नहीं स्पष्ट है

हृदय में आशंकाओं का वास है

फिर भी मन में एक आस है

मंजिलें मिलेंगीं राहें जीतने के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

 

तूफानों का डटकर वार सहना है

जीवन सागर को हंसकर पार करना है

विश्वास की ज्योति ही सबसे ख़ास है

लिए हुए मन में एक आस है

परिदृश्य बदलेगा मंथन के बाद

अमृतपान होगा मंथन के बाद

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