जो प्राप्य नहीं उस ओर भागे

जो संभव नहीं उसको ही चाहे

जो स्वीकारे नहीं उसे करे अर्पण

क्यों है ऐसा अनोखा ये मन?

 

दूर के प्रकाश को देख चमके

दूर की शीतल वायु से दमके

दूर से ही भिगोये इसे सावन

क्यों है ऐसा अनोखा ये मन?

 

देखी बातों को भी करे अनदेखा

देखे अलगाव की ना दिखे रेखा

देख मरीचिका को माने ये वन

क्यों है ऐसा अनोखा ये मन?

 

मन भागे अंजान की तलाश में

मन सिमित ना हो इस आकाश से

मन के पास एक ही तो जीवन

अच्छा है ! ऐसा अनोखा है ये मन !

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