मन बगिया को सिंचित करने

मंद गति से कुछ सकुचाते

भोर की स्वर्ण किरणों समान

अधरों पर आती वह मुस्कान |

 

वात्सल्य का दर्पण अप्रतिम

द्रवित होता दूरियों का हिम

कभी किसी वृद्ध का सम्मान

अधरों पर आती वह मुस्कान |

 

जीवन-उमंगों का फैलाती पैगाम

हृदय-तरंगों को देती एक नाम

निशब्द वाद्य पर छेदती सुरीली तान

अधरों पर आती वह मुस्कान |

 

वेदना किये यह अदभूत घूँघट

अंतर में असीम दुःख का वट

जग ना पाए यह पीड़ा पहचान

अधरों पर आती वह मुस्कान |

 

पीड़ा-प्रवाह का ज्वार प्रबल

टूटे नेत्र-बाँध बह निकला जल

इसी प्रतीक्षा में थामे अपने प्राण

काश ! अधरों पर आती वह मुस्कान |

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