जब उन आँखों के आँसू नही थम पा रहे थे ,

माँ के हाथ के इशारे किस ओर दिखा रहे थे ?

चमक सी आ गयी आँखों में उस ओर देखकर,

खिलौने कई पड़े थे बड़े जतन से कितने सहेजकर !

 

काली मोटी आँखें उसकी गोल सा शरीर था ,

दोस्तों के बीच वो थोड़ा खुश थोड़ा गंभीर था !

छोटे छोटे हाथ बढे तब वह थोड़ा सा सकुचाया ,

परी के हाथों में आकर वह क्यों इतना घबराया ?

 

छूटती दुनिया के बीच जाने को उसने जोर लगाया,

उन कोमल हाथो की ताकत को वह परख न पाया !

क्यों ये बच्ची मेरे ही पीछे ऐसे रो रोकर पड़ी हैं ?

उसके पास होंगे कई खिलौने, उनमे क्या कमी है ?

 

रोना बंदकर माँ के आँचल से जब  परी ने देखा,

मासूम मुस्कान को देख दिल ने खुद से ये पूछा ,

मैं तो एक साधारण खिलौना, मुझसे क्यों खेलेगी?

दो  दिन में भर जायेगा  मन , मुझे  फिर  फेंकेगी?

 

एक अजीब से सुकून ने उसको आकर ऐसे घेरा,

उसकी वजह से माँ की गोद में परी ने रोना छोड़ा !

अपने होने का एहसास उसको पहली बार  हुआ ,

दो पल के इस साथ ने उसके अंतर को ऐसे छुआ !

 

घर पहुंचकर परी ने उसे बड़े  नाजो से संवारा था ,

परी की खातिर कुछ भी करना उसको अब गंवारा था !

उठते- बैठते खेलते-खाते हर वक़्त परी के साथ था ,

दोनों की इस ख़ुशी में जरूर  भगवान का हाथ था !

 

जब भी परी रोती थी माँ उसको पकड़ा देती थी,

परी को खिलाने की भी उसकी जिम्मेदारी होती थी !

डगमग कदमों से चलकर जब परी गिर जाती थी,

गोद में लेकर माँ  परी को उसके पास ही लाती थी !

 

परी की हँसी को वह  ज़िन्दगी लगा समझने,

उसके दर्द को दूर करने  लगायी ताकत उसने !

सबसे अच्छा सबसे प्यारा परी का वो खिलौना था ,

इस ख़ुशी का उसको एक दिन गुरूर तो आना था !

 

उसे लेकर परी कभी दोस्तों के बीच ना जाती थी,

उसको ये बात कोशिश कर भी समझ ना आती थी !

वो था इतना अच्छा कि औरो की नजर से बचाती थी,

या था इतना बेढ़ब कि इससे हमेशा कतराती थी ?

 

धीरे धीरे परी के पँखों ने भी उड़ान भरी ,

रोना भूल वह अपने पैरों पर चलने लगी !

छोटी सी दुनिया के बाहर भी एक दुनिया थी,

बस्ते का बोझ लिए वो किताबो संग चली थी !

 

खिलौने कुछ छूटे, कुछ शाम को मिलते थे,

वो रोज अब  भी मिलता, कुछ इससे जलते थे !

पर शायद वो  नही रहा था परी का सबसे प्यारा,

किताबें और नए खिलौने लेते थे समय सारा !

 

परी को खुश देखकर वो भी खूब हँसता था,

रोती गिरती परी के सपने पुराने रचता था !

बच्ची की किलकारी अब ठहाकों में गयी बदल,

उसकी ख़ुशी इसमें ही कि इसकी उससे हुई पहल !

 

माँ इक दिन परी के लिए एक तोहफा लायी,

देख परी  ने दौड़ लगा दी लेकर एक अंगड़ाई !

टोकरी में बिठा उसे, साइकिल रोज चलाती थी,

डगमग डगमग चाल अब हवा से बतियाती थी !

 

गिरा एक दिन टोकरी से वो, परी ने ना दिया ध्यान,

साइकिल के नीचे आया वो पर बचे थे उसके प्राण !

काली मोटी आँखें उसकी दूर जाती परी को देखती ,

साइकिल से उतर एक बार बस मेरी ओर मुड़ती !

 

शरीर का कोई हिस्सा गया पर दर्द था सीने में ,

खुद को वह भूल गया था परी के संग जीने में !

आज आँसू उसके थे पर परी ने ना उसे हँसाया,

टूटे हिस्सों समेत धूल झाड़ते माँ ने उसे उठाया !

 

वह ये भूल गया था वो तो बस एक खिलौना है ,

रोती बच्ची को हँसाना यही तो उसका जीना हैं !

उसने अपना काम किया बदले की क्यों उम्मीद थी ?

गुजरा दौर था वो जिसकी खुशियाँ देने की जिद थी !

 

घर के पिछले आँगन की टूटी अलमारी में दबा कहीं ,

परी और उसकी खुशियाँ बड़ीं, उसके बस की बात नहीं !

दरार से आती आवाज़ों में परी को सुनने की आखरी आस है ,

“माँ वो है मेरा सबसे प्यारा खिलौना जो नही अब मेरे पास है” !

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