उड़ने की चाहत लिए आकाश को तू देख रहा ,

पंख फैलाने में फिर क्यों , तू इतना सहम रहा ?

किस बात से डरा तू , क्यों इतना घबराया है ?

जमीं से जकड़ा है तूझे, वो तो तेरा ही साया है !

सोच ना कि गिर पड़ा तो कैसे उठ पाएगा ,

सोच कि गर उड़ पड़ा तो आस्मां बुलाएगा 

अलग तू मुर्दा बुतों से जो अपने पैरों पर खड़े ,

भरोसे की तू उड़ान भर, तेरे सपनें तो हैं बड़े !

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