यात्रा का अलौकिक अनुभव तो रेल में ही मिलता है  । हवाई यात्रा तो इंसान समय की मजबूरी में करता है । चलिए इस बात को आम नहीं करते हैं । इसको यूँ कहें की हमें ( हम = मैं, बिहारी हैं न ) रेल यात्रा ज्यादा पसंद हैं । एक तो एकाग्र भाव से उन किताबों को पढ़ पातें हैं जिन्हें पढ़ने का सोच रखा था पर पढ़ ना पाये थे । इसे अब समयाभाव का बहाना बनाये या पढ़ने के प्रति हमारी प्रतिबद्धता की कमी । लेकिन यकीन मानिए, अगर एक बार पढ़ने की लत लग गयीं तो दुनिया ही अलग नजर आएगी । और इस सकारात्मक मतिभ्रम के लिए आपको किसी नशे की आवश्यकता भी नहीं होगी । रेल यात्रा का दूसरा फायदा यह की एक से एक चरित्र मिलेंगे आपको । अब ये परस्पर विरोधी बात नहीं है कि शायद सामने वाले के लिए हम भी किसी “कैरेक्टर” से कम ना हो । ख़ैर अभी तो हम दुनिया अपनी नजरों से देख रहे हैं । अंततः हवाई और रेल यात्रा को अर्थशास्त्र के तराजू पर तौलने पर उपरोक्त सारे कारण गौण ही नज़र आते हैं ।

हाँ तो हमारी गाड़ी छुक-छुक करती हुई बढ़ी जा रही है । हम कभी अपने किताब को और कभी साथ बैठे लोगो को पढ़ रहें हैं । किताब तो ज़िन्दगी और उसके मायने बता रही है और सहयात्री ज़िन्दगी दिखा रहें हैं । एक तुर्रम खाँ बैठें हैं साथ । तीस-पैतीस के मध्य ही होंगे जनाब । बकौल तुर्रम खाँ,  महीने का दो-ढाई लाख कमा लेते हैं । भाई ये बताओ सामने वाले ने तो बस ये पूछा की करते क्या हो । अब बेचारा बैठे बैठे ऊब गया होगा । बात कुछ तो बोल कर शुरू करनी है । अब आप हैं कि करना क्या छोड़कर अपनी दो राज्य और तीन जिलों में दो भाई और एक पिता की जमीन-जायदाद का ब्यौरा देने लगे । काश हिंदी फ़िल्मो की तरह पूछने वाला आयकर विभाग में होता ।

एक बूढ़े चचा आये अपनी टोकरी लेकर । शरीर से कंकाल पर आँखों में उम्मीद लेकर वो पानी की बोतलें और बिस्कुट के पैकेट बेच रहें हैं । उनकी दशा देखकर खुद की ज़िन्दगी अचानक से बहुत अच्छी दिखने लगी । ये अलग बात है की दस मिनट बाद हम फिर अपनी ज़िन्दगी का रोना शुरू कर देंगे । हाँ तो हमारे तुर्रम खाँ ने एक पैकेट उठाया और जेब से पच्चीस रुपये दिए चचा को । चचा ने कहा , “बाबूजी तीस हुए” । तुर्रम खाँ कहाँ चुप बैठने वाले थे । “पब्लिक को लूटते हो ? पच्चीस का माल तीस में ? अभी शिकायत करे तुम्हारी रेल मंत्री से ?” बेचारे चचा किसी तरह सम्भलते हुए बोले, “बाबूजी सेठ ले लेता है सारे पैसे । यही पाँच रुपये हमारी कमाई है” । तुर्रम खाँ का पारा तो जैसे सातवे आसमान पर चढ़ गया । बिस्कुट चचा की टोकरी में रखते हुए बोले, “भागो यहाँ से, दुबारा आना मत इस डिब्बे में” । 

भाई, अब पाँच रुपये के लिये रेल मंत्री को क्यों परेशान करना ? व्यस्त आदमी हैं वो । एक तो आपसे दुगुनी उम्र का आदमी आपको बाबूजी कहकर संबोधित करते हुए ईमानदारी से पाँच रुपये का हिसाब दे रहा है और आप हैं कि । समझ सकते हैं हम कि ढाई लाख महीने का बड़ी मेहनत से कमाते होंगे और पाँच रुपये उस मेहनत का बहुत अहम् हिस्सा होगा । पर वही से ढाई सौ ग्राम दिल और पाँच सौ ग्राम जिगर भी कमा लेते । खर्च करने में सुविधा होती । ऐसे तुर्रम खानों को मेरा साष्टांग दंडवत प्रणाम । 

रात के समय अगर ट्रेन में आपके आसपास कोई बच्चा हो तो यकीन मानिये आपका क्रमिक विकास से विश्वास उठ जाएगा । मनुष्य सीधे किशोरावस्था में प्रवेश करना चाहिये । पता नहीं इन बच्चों को दुनिया की व्यवस्था का ऐसा कौन सा पहलू रात के दो बजे नागवार गुजरता है कि उसी समय वो अपनी आवाज़ बुलंद कर देते हैं । बच्चे, बस चार घन्टे रूक जाओ फिर हम साथ मिलकर आन्दोलन करेंगे । पर नहीं । शुभस्य शीघ्रम् । तो ऐसे ही एक बच्चे के विलाप कृपा से हमने रात की नींद का त्याग किया और दिन में सोने की चेष्टा करने लगे । 

आँख लगी ही थी कि किसीने उठाया ,  “भाई साहब,  जरा सामान एडजस्ट कर लीजिये” । अनमने भाव से हम उतरे और देखा कि किसी स्टेशन पर गाड़ी खड़ी है । हमने अपना एक सूटकेस थोडा सा हिलाया, और खड़े हुए । देखते क्या हैं कि जनाब बारह विभिन्न प्रकार के बैग और सूटकेस के साथ पधारे थे । पूरा घर ही उठाये लाये थे क्या ये जनाब ? अपनी नहीं तो अपने सहयात्रियों के सुविधा का तो ध्यान रखना चाहिए । आदमी थोडा मदद कर दे लोगो की पर ये तो सर पर बैठने की जगह माँग रहे हैं । ऐसा थोड़े ही होता है । हमारा तो दिमाग नींद की कमी से वैसे ही भन्नाया हुआ था और अब ये । 

कुछ सूटकेस को ठिकाने  लगाकर उन्होंने थोड़ी जगह बनायी । तब तक टी.टी. महोदय भी आ पहुँचे । इस नए आगंतुक ने टी.टी से कुछ कहा । जवाब सुनकर हमें भी कंप्यूटर पर बहुत गुस्सा आया । “सब सिस्टम ऑनलाइन हो गए हैं । हमारी तो कमाई ही ख़त्म हो गयी” । सत्य वचन । तकनीक तो आनी ही नहीं चाहिए थी देश में । पहले टी.टी साहब कही ज्यादा कमीशन कमा लेते थे । सरकार को सोचना चाहिए । पर जिस प्रकार टी.टी साहब ‘बेटा’ कहकर बात कर रहे थे , दिल छू लिया उन्होंने । हर इंसान श्याम-श्वेत का सम्मिश्रण होता है । बुराई और अच्छाई तो समय और परिस्थिति का यथोचित मुखौटा है । 

तो इन जनाब के पीछे एक महिला और एक नवविवाहित जोड़ा आया तब जाकर हमें कुछ-कुछ समझ आया । हम वापस अपने ऊपर वाले बर्थ पर चले गए । ये दो भाई थे । छोटे भाई की अभी अभी शादी हुई थी और ये अपने गृह जिले से जा रहे थे जहाँ बड़ा भाई नौकरी करता है । छोटे को भी वही नौकरी खोजनी और करनी है । तो इतना सामान तो लगेगा नए जगह गृहस्थी बसाने में । फिर दो लड़के और आये । आत्मविश्वास से लबरेज । पूछने पर पता चला कि कही साक्षात्कार देने जा रहे थे । चढ़ जाओ बेटा सूली पर । स्वागत है असली दुनिया में ।

हम फिर से अपनी किताब में ज़िंदगी के सच्चे मायने ढूंढने लगे । मुख्य किरदार सिखा जाती है कि ज़िन्दगी  बड़े सपनों में, बड़ी सफलता में नहीं हैं बल्कि छोटी छोटी खुशियों और हर पल में ही ज़िन्दगी हैं । सपने देखों उन्हें पूरा करो पर उसकी कीमत आपके परिवार और चाहनेवालों से बढ़कर ना हो । नींद ने हमें अपने आगोश में लेना शुरू किया पर हम खुद को खुद पर और हमारे जैसे लाखो-करोड़ों विस्थापितों पर तरस खाने से ना रोक पाये । हम तो अपने ही देश में विस्थापित हैं जो अपनी जड़ों से दूर अपनी ज़मीन तलाश कर रहे हैं । आधुनिक युग में इस नए तरह के विस्थापितों का दर्द कौन समझे ? विडंबना तो ये है कि इसे विस्थापन नहीं,  सफलता की संज्ञा दी गयी है । अब सोते हैं । फिर मिलेंगे किसी और यात्रा में । 

Advertisements