प्रेरणा कही से भी मिल सकती है । इसकी एक बानगी देखिए । कल एक दोस्त की गाड़ी से कही जा रहे थे । रास्ते में एक जगह चाय पीने के लिए उसने गाड़ी खड़ी की । अब चाय तो साथ देने की चीज़ है बस पीने की नहीं । ख़ैर सीधे मुद्दे पर आते हैं । वहाँ एक सफ़ेद रंग की मारुती 800 पूरे शान के साथ खड़ी थी । उसके पीछे एक प्रतीक चिन्ह या सरल भाषा में कहे तो लोगो लगा था जिसने हमारा ध्यान आकर्षित किया । ये लोगो था फेरारी का । अब समझ आया शान के साथ क्यों ? सौ बात की एक बात । सोच बड़ी होनी चाहिए । हम किसी से कम हैं क्या ? होंगे कम पर हम नहीं मानते । अपनी मारुती 800 वाली ज़िन्दगी में भी खुद को फेरारी ही समझते हैं । इस सोच के साथ हम आगे बढे अपने गंतव्य की ओर । 
दोस्त की गाड़ी के आगे और पीछे “एल” लिखा हुआ था ।    हमारा  मित्र तो तीन साल से गाड़ी चला रहा है पर अभी भी “एल” ही हैं ! उसका उत्तर हमें लाजवाब कर गया । “एल देखकर सामने वाला खुद-ब-खुद साइड दे देता है नौसिखया समझकर” । काश ज़िन्दगी में भी कोई ऐसा बोर्ड होता जिसे लगा देखकर मुसीबतें साइड दे देतीं । पर नहीं ! ज़िन्दगी के इस सड़क पर जितनी जल्दी महारत हासिल कर लो उतना अच्छा। । एल का बोर्ड देखकर कुचल दिए जाओगे । 

अपने उच्च विचार लेकर हमने अपना ध्यान सड़क पर केंद्रित किया । हमारे आगे एक शुद्ध भारतीय ट्रक जा रहा था । हमारी नज़रें ट्रक के पीछे लगे नजरौटे की भयानक नज़रो से टकरायी । ऐसा लगा रहा था कि जैसे वो बुरी बलाओं को दूर रखने वाला प्राणी हमें और हमारे विचारों को जीभ दिखा रहा हो । हम भला क्यों इस तुच्छ निर्जीव वस्तु से हार मानते ? हमारे अहम् ने हमारी नज़रें उठा दी । तो नजरौटे के ऊपर लिखा पाया , “30 के फूल 75 की माला, बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला” । यकीन मानिए पूरे सफ़र के दौरान आइना देखने की हिम्मत ना हुई हमारी । अब बताइये भला ये नस्लभेद नहीं तो क्या हैं ? बुरी नज़र वाले का मुँह काला ही क्यों होगा ? हरा, पीला या बैगनी क्यों नहीं ? ये सिद्धांत किसने बनाया की सफ़ेद बेहतर और काला कमतर ? जब बना तब बना, अब तो बदलो इस सोच को । पर सोच बदल गयीं तो फेयरनेस क्रीम वालो का क्या होगा ? कुछ नहीं होगा, वो डार्कनेस क्रीम बना लेंगे । कमाओ कमाना है तो । पर काला गोरा सब एक समान । 

मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ । थोड़ा और ऊपर देखा तो सुन्दर देवनागरी लिपि में लिखा था , “लटकलें ता गइले बेटा” । समझते देर ना लगी की ट्रक जरूर बिहार का होगा । नंबर प्लेट ने इस बात पर मोहर लगा दी । वैसे तो ये वाक्य नादान बच्चों को चेतावनी है कि अगर ट्रक के पीछे लटके तो चले जाओगे । कहाँ जायेंगे ये बताना आवश्यक नहीं । पर इन चार शब्दों में गीता-सार छुपा था । “हे पार्थ ! किसी वस्तु अथवा किसी प्राणी से अत्याधिक लगाव ना रखो । उसे पकड़ कर लटक ना जाओ । अन्यथा जीवन में बहुत कष्ट होगा । रसातल में चले जाओगे” । ट्रक वाले के अनासक्ति के असीम ज्ञान पर हमारा सर श्रद्धा से झुक गया । 

“सो रहे हो क्या”? झुका सर देखकर मित्र ने आवाज़ लगायी । अब उसे कौन समझाए की अभी-अभी हमें ज्ञान की प्राप्ति हुई है । उसने हमपर ध्यान नहीं दिया और ट्रक को ओवरटेक करने की जुगत में लग गया । “ये जो ट्रक वाले लिखतें हैं ना कि जगह मिलने पर पास देंगे, अगर इनके जगह मिलने का इंतज़ार करते रहें तो पहुँच गए समय पर” । हम चौंके । ज्ञान का कुछ वाई-फाई आदान प्रदान कर दिया क्या हमने अपने मित्र को ? कितना सही कहा उसने । ज़िन्दगी की सड़क पर पास लेने के लिए अपनी जगह तो हमें खुद ही बनानी पड़ती हैं । 

ट्रक के बगल से गुजरते हुए आखिरी बार हमने हमारे दार्शनिक ट्रक को सम्मान की दृष्टि से देखा । पर ये सम्मान ज्यादा देर टिका नहीं । हम ज्यादा ही भाव दे बैठे थे इस ट्रक वाले को । इन जनाब ने अपनी डीजल टंकी पर लिखवा रखा था, “गाड़ी चलती है डीजल से, पानी से नहीं । दोस्ती हमसे करो, गाड़ी से नहीं” । ये तो इन्होंने निरे मूर्खो वाली बात कर दी । अव्वल तो कौन इनके टंकी पर पढ़कर इनसे दोस्ती करने जाएगा ? और अगर चला भी गया तो किसे पता नहीं होता की गाड़ी डीजल से चलती है ? पर शायद नहीं होता है । या शायद पता होकर भी हम हमारी आँखें मूंद लेते हैं ।

किसी इंसान से परिचित होने के लिए हम उसकी सफलता-असफलता, उसके आचरण का भी ब्यौरा लेते हैं । पर क्या कभी हम उसकी ज़िन्दगी रूपी गाड़ी के ईंधन के बारे में सोचते हैं ? लोगो के बारे में हम अपनी ही राय बना लेते हैं । अच्छे-बुरे, सही-गलत के तराजू पर उन्हें हम फेरारी से लेकर साइकिल-रिक्शा तक में वर्गीकृत करते हैं । पर ये नहीं सोचते की शायद उस साइकिल-रिक्शा में भी कभी इंजन लगा था । पर परिस्थितियों ने उसे कभी डीजल भरने ही नहीं दिया । वो तो पानी पीकर ही संतुष्ट हो गया । काश हम बाह्य-आवरण से ज्यादा महत्व इंसान को दे पाते । हमें भी सिखना है । मुश्किल है । नामुमकिन नहीं ।                

“कहाँ खोए हुए हो ? पहुँच गए हम” । मित्र के आवाज़ ने हमारी विचार श्रृंखला तोड़ी । अच्छा तो अभी चलते हैं । कोई बात हो तो आवाज़ देना । हॉर्न प्लीज ! अभी के लिए, ओके टाटा ! 

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